इस दिन झाड़ू खरीदना होता है बहुत अशुभ, कही आप भी तो नहीं करते है ये गलतियां?

घर में कई ऐसी चीजें होती है जिनका ताल्लुक वस्तु से होता है, वही बात यदि झाड़ू की करें तो झाड़ू एक ऐसी घरेलू वस्तु है जिससे घर की साफ-सफाई की जाती है। यह घास, फाइबर, प्लास्टिक अथवा सींख की होती है तथा इसका उपयोग प्रत्येक घर में ही किया जाता है। उपयोग करते-करते झाड़ा खराब भी होती है तथा इसे बदलकर बाजार से नई झाड़ू भी लाई जाती है। पर क्या आप जानते हैं कि वास्तु शास्त्र के मुताबिक, झाड़ू क्रय करने के भी कई नियम होते हैं। यूं ही किसी भी झाड़ू को खरीद लाना आपके जीवन पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।

हिंदू धर्म में झाड़ू मां लक्ष्मी का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए पुरानी अथवा खराब झाड़ू को बृहस्पतिवार तथा शुक्रवार के दिन तो घर से बिल्कुल भी न निकालें। बृहस्पतिवार श्री नारायण का और शुक्रवार मां लक्ष्मी का वार होता है। इस दिन घर से झाड़ू निकालने से ईश्वर रुष्ठ हो जाते हैं तथा उस घर से चले जाते हैं। इस पर पैर पड़ जाना अथवा इसे लांघना भी अशुभ माना जाता है।
मंगलवार तथा शनिवार का दिन झाड़ू क्रय करने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। ऐसा करने से घर की आर्थिक हालात में सुधार आता है। घर में संपन्नता आती है। शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि वार के साथ-साथ पक्ष का ध्यान रखना भी आवश्यक है। झाड़ू कृष्ण पक्ष में खरीदी जाए तो अच्छा रहता है। प्रथा है कि इसे घर की ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां किसी की भी दृष्टि न जाए तथा इसे बिस्तर के नीचे तो बिल्कुल भी नहीं रखना चाहिए। झाड़ू लगाने के वक़्त की बात करें तो सूर्यास्त के पश्चात् इसके इस्तेमाल की मनाही होती है।

Mahashivratri 2021: महाशिवरात्रि पर करें ये उपाय, प्रसन्न हो जाएंगे भोलेबाबा

CG24X7NEWS वेबडेसक |आज महाशिवरात्रि है। इस मौके पर सुबह से ही देशभर के मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमर रही है। इस दिन भक्त भोलेनाथ की पूजा और व्रत करते हैं। प्रत्येक वर्ष यह त्यौहार फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को आता है। इस बार महाशिवरात्रि पर शिव योग के साथ घनिष्ठा नक्षत्र होगा और चंद्रमा मकर राशि में विराजमान रहेंगे। इस दिन काले तिलों सहित स्नान करके व व्रत रख के रात्रि में भगवान शिव की विधिवत आराधना करना कल्याणकारी माना जाता है। दूसरे दिन अर्थात अमावस के दिन मिष्ठान्नादि सहित ब्राहम्णों तथा शारीरिक रुप से अस्मर्थ लोगों को भोजन देने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए। यह व्रत महा कल्याणकारी होता है और अश्वमेध यज्ञ तुल्य फल प्राप्त होता है।

इस दिन किए गए अनुष्ठानों , पूजा व व्रत का विशेष लाभ मिलता है। इस दिन चंद्रमा क्षीण होगा और सृष्टि को ऊर्जा प्रदान करने में अक्षम होगा। इसलिए अलौकिक शक्तियां प्राप्त करने का यह सर्वाधिक उपयुक्त समय होता है जब ऋद्धि- सिद्धि पा्रप्त होती है। इस रात भगवान शिव का विवाह हुआ था। भारतीय जीवन में ऐसे लोक पर्व वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भले ही धूमिल हो रहे हों परंतु इनका वैज्ञानिक पक्ष आस्था के आगे उजागर हो नहीं पाता। भारतीय आस्था में चाहे सूर्य ग्रहण हो या कुंभ का पर्व, दोनों ही समान महत्व रखते हैं। शिव रात्रि एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है जो देश के हर कोने में मनाया जाता है। यह पर्व भगवान शिव एवं माता पार्वती के मिलन का महापर्व कहलाता है। इस व्रत से साधकों को इच्छित फल,धन, वैभव, सौभाग्य, सुख समृद्धि, आरोग्य, संतान आदि की प्राप्ति होती है।

मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रुप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोश के समय शिव तांडव करते हुए ब्रहाण्ड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसी लिए, इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा जाता है। काल के काल और देवों के देव महादेव के इस व्रत का विशेष महत्व है। एक मतानुसार इस दिन को शिव विवाह के रुप में भी मनाया जाता है। ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्द्धरात्रि के समय करोड़ों सूर्य के तेज के समान ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था।

स्कंद पुराण के अनुसार –

चाहे सागर सूख जाए, हिमालय टूट जाए, पर्वत विचलित हो जाएं परंतु शिव-व्रत कभी निष्फल नहीं जाता। भगवान राम भी यह व्रत रख चुके हैं। व्रत की परंपरा प्रातः काल स्नान से निवृत होकर एक वेदी पर ,कलश की स्थापना कर गौरी शंकर की मूर्ति या चित्र रखें । कलश को जल से भर कर रोली, मौली , अक्षत, पान सुपारी ,लौंग, इलायची, चंदन, दूध,दही, घी, शहद, कमलगटटा्,, धतूरा, विल्व पत्र, कनेर आदि अर्पित करें और शिव की आरती पढ़ें । रात्रि जागरण में शिव की चार आरती का विधान आवश्यक माना गया है। इस अवसर पर शिव पुराण का पाठ भी कल्याणकारी कहा जाता है।

विशेष चेतावनी –

बेल पत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं। बेल पत्र के तीनों पत्ते पूरे हों ,टूटे न हों । इसका चिकना भाग शिवलिंग से स्पर्श करना चाहिए। नील कमल भगवान शिव का प्रिय पुष्प माना गया है। अन्य फूलों मे कनेर,आक, धतूरा, अपराजिता,,चमेली, नाग केसर, गूलर आदि के फूल चढ़ाए जा सकते है। जो पुष्प वर्जित हैं वे हैं- कदंब,केवड़ा,केतकी। फूल ताजे हों बासी नहीं । इस दिन काले वस्त्र न पहनें। इसमें तिल का तेल प्रयोग न करें। पूजा में अक्षत ही चढाएं। टूटे चावल न चढ़ाएं। ऐसे करें पूजा भगवान शिव को सफेद फूल बहुत पसंद होता है, लेकिन भगवान शिव को सफेद फूल बहुत पसंद होता है, लेकिन केतकी का फूल सफेद होने के बावजूद भोलेनाथ की पूजा में नहीं चढ़ाना चाहिए। भगवान शिव की पूजा करते समय शंख से जल अर्पित नहीं करना चाहिए। भगवान शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित माना गया है। शिव की पूजा में तिल नहीं चढ़ाया जाता है। तिल भगवान विष्‍णु के मैल से उत्पन्न हुआ माना जाता है, इसलिए भगवान विष्‍णु को तिल अर्पित किया जाता है लेकिन शिव जी को नहीं चढ़ता है।

भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी टूटे हुए चावल नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर नारियल का पानी नहीं चढ़ाना चाहिए। शिव प्रतिमा पर नारियल चढ़ा सकते हैं, लेकिन नारियल का पानी नहीं। हल्दी और कुमकुम उत्पत्ति के प्रतीक हैं, इसलिए पूजन में इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। बिल्व पत्र के तीनों पत्ते पूरे होने चाहिएं, खंडित पत्र कभी न चढ़ाएं। चावल सफेद रंग के साबुत होने चाहिएं, टूटे हुए चावलों का पूजा में निषेध है। फूल बासी एवं मुरझाए हुए न हों। विभिन्न सामग्री से बने शिवलिंग का अलग महत्व फूलों से बने शिवलिंग पूजन से भू- संपत्ति प्राप्त होती है। अनाज से निर्मित शिवलिंग स्वास्थ्य एवं संतान प्रदायक है। गुड़ व अन्न मिश्रित शिवलिंग पूजन से कृषि संबंधित समस्याएं दूर रहती हैं। चांदी से निर्मित शिवलिंग धन- धान्य बढ़ाता है। स्फटिक के वाले से अभीष्ट फल प्राप्ति होती है। पारद शिवलिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है जो सर्व कामप्रद, मोक्षप्रद, शिवस्वरुप बनाने वाला, समसत पापों का नाश करने वाला माना गया है।

महाशिवरात्रि पर दुर्लभ संयोग: शिव-पार्वती की पूजा से मिलेगा सभी व्रतों का पुण्य.. जानिए शुभ मुहूर्त व पूजन विधि.

महाराज : दैववर्त मिश्रा

धर्म: देशभर में 11 मार्च को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा। तीन संयोगों से 101 साल बाद इस महाशिवरात्रि पर एक विशेष संयोग बनने जा रहा है। इस दिन भोलेनाथ के उपासक उनकी पूजा-अर्चना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति कर सकते हैं।

शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजन विधि

11 मार्च को सुबह 9:24 तक शिव योग रहेगा। इसके बाद सिद्ध योग लग जाएगा, जो 12 महाशिवरात्रि का पर्व 11 मार्च को है और ज्योतिषविदों के मुताबिक, 101 साल बाद इस त्योहार पर एक विशेष संयोग बनने जा रहा है। मार्च सुबह 8:29 तक रहेगा। शिव योग में किए गए सभी मंत्र शुभफलदायक होते हैं। इसके साथ ही रात 9:45 तक घनिष्ठा नक्षत्र रहेगा।

इस बार क्या है शुभ मुहूर्त- इस साल महाशिवरात्रि पर निशीथ काल में पूजा का मुहूर्त रात 12 बजकर 06 मिनट से 12 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। पूजा की कुल अवधि करीब 48 मिनट तक रहेगी। पारण मुहूर्त 12 मार्च को सुबह 6 बजकर 36 मिनट से दोपहर 03 बजकर 04 मिनट तक रहेगा।

क्या करें और क्या न करें..

प्रात:काल में जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद मिट्टी के लोटे में पानी या दूध भरकर उसके ऊपर बेलपत्र डालें। धतूरे के फूल डालें। चावल आदि डालें और फिर इन्हें शिवलिंग पर चढ़ाएं। यदि आप शिव मंदिर नहीं जा सकते हैं तो घर पर ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर आप उनका पूजन कर सकते हैं। शिव पुराण का पाठ करें और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करें।

महाशिवरात्रि के दिन रात्रि जागरण का भी विधान बताया गया है। इसके बाद शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार शिवरात्रि का पूजन निशीथ काल में करना सबसे ज्यादा सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हालांकि भक्त रात्रि के चारों पहरों में से अपनी सुविधा के अनुसार इस दिन का पूजन कर सकते हैं।

ज्योतिषियों का कहना है कि महाशिवरात्रि के दिन शिवयोग, सिद्धियोग और घनिष्ठा नक्षत्र का संयोग आने से त्योहार का महत्व और ज्यादा बढ़ गया है। इन शुभ संयोगों के बीच महाशिवरात्रि पर पूजा बेहद

भोलेनाथ के विवाह में देवी-देवताओं समेत दानव, किन्नर, गंधर्व, भूत, पिशाच भी शामिल हुए थे। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग को गंगाजल, दूध, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से स्नान करवाया जाता है। ज्योतिषियों का ये भी कहना है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को संसार के कल्याण के लिए शिवलिंग प्रकट हुआ था।

श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ धर्मनगरी बिलासपुर में… आचार्य पंडित देवव्रत मिश्रा जाता नवम दिवस की कथा में श्रीमद् भगवत गीता उपदेश…

दीपिका शर्मा बिलासपुर:-

श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ धर्मनगरी बिलासपुर में किया जा रहा था जिसके आचार्य पंडित देवव्रत मिश्रा जाता नवम दिवस की कथा में श्रीमद् भगवत गीता उपदेश करते हुए इस भारत भूमि को धर्म क्षेत्र की उपाधि दी है हर मनुष्य जो है इस भारत भूमि में धर्म करने के लिए अधर्म से युद्ध करने के लिए इस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं साथ ही साथ महाराज जी कहते हैं हर हर युग में धर्म और अधर्म के बीच युद्ध हुआ है और आगे भी धर्म और अधर्म के बीच युद्ध होता रहेगा अब मनुष्य को चयन करना है कि वह धर्म का साथ देगा या अधर्म का जिस प्रकार भीष्म पितामह जो जीवन में कभी कोई उनके द्वारा पाप कर्म नहीं होगा

लेकिन अधर्म का साथ देने के कारण अधर्म को होने देने के कारण अधर्म को होते देखने के कारण उनको बाणों की शैया में सोना पड़ा और त्रेता युग में जटायु जी महाराज धर्म की रक्षा करते हुए मां सीता को बचाने हेतु रावण से लड़ गए और वीरगति को प्राप्त होगा लेकिन हर व्यक्ति का हर मनुष्य का हर जीव का धर्म है की स्त्री का रक्षा करना स्त्री की मर्यादा करना स्त्री को मां स्वरूप देखना और जटायु जी महाराज ने धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण को निछावर कर दी इसलिए अंत समय में प्रभु श्री राम के गोद में अपना अंतिम समय अंतिम सांस प्रभु की गोद में लिए सभी भारत भूमि में हमेशा धर्म आत्माओं का जन्म होते रहा है और होते रहेगा मनुष्य को हमेशा धर्म का साथ देना चाहिए कभी भी अधर्म होते हुए नहीं देखना चाहिए हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेंगे और वैसे भी यह पृथ्वी कर्मभूमि हैं कर्म प्रधान विश्व रचि राखा हर व्यक्ति सत्य की राह पर चलते हुए धर्म का साथ देते हुए अपना जीवन यापन करना चाहिए इसके पश्चात तुलसी वर्षा शोभा यात्रा के द्वारा यह यज्ञ का विश्राम हुआ

शिवरात्रि के बारे में कुछ अनोखी बाते… श्री शुभम जी महाराज से शिव महिमा की जानकारी…

दीपिका शर्मा बिलासपुर:-

शिवरात्रि के बारे में कुछ अनोखी बाते जानते है श्री शुभम जी महाराज से जो लगतार कई वर्षो से शिव महिमा की जानकारी देते आ रहे है,,भगवान शिव हमेसा अपने रौद्र रूप में रहते है जिसकी वहज से भक्तों को उस रूप में दर्शन नही दे सकते, क्योंकी उनका रूप भयानक दिखाई पड़ता है, इसलिए शिवरात्रि के ही दिन उन्होंने शिव रूप अर्थात कल्याणकारी रूप लिए थे। इसी कारण शिव रात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है ।

DEVOTIONAL : राजिम त्रिवेणी संगम में… आज लगी आस्था की डूबकी… 11 मार्च तक चलेगा मेला

रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रयागराज राजिम त्रिवेणी संगम में आज माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने सूर्याेदय से पहले आस्थी की डूबकी लगाई। आज से शुरु होने वाला पुन्नी मेला 11 मार्च को महाशिवरात्रि तक चलेगा। फिलहाल मेला स्थल का शुभारंभ नहीं हुआ है। आज दोपहर बाद विधानसभा अध्यक्ष डाॅ. चरण दास महंत के मुख्य आतिथ्य और प्रदेश के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू की अध्यक्षता में मेला उत्सव का उद्घाटन किया जाएगा।

मेला शुभारंभ के मौके पर राजिम त्रिवेणी संगम दर्शन के लिए प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव, शिक्षा मंत्री डाॅ. प्रेमसाय सिंह टेकाम के अलावा अन्य की भी मौजूदगी संभावित है। आज से लेकर 11 मार्च तक राजिम त्रिवेणी संगम में हर रोज आस्था की डूबकी लगेगी। बीते सालों में जुटी भीड़ के मुताबिक इस बार भी पर्याप्त भीड़ की आशंका से इंकार नहीं किया जा रहा है।

सीएम ने की जरूरी अपील

चूंकि प्रदेश में कोरोना महामारी का प्रभाव कम नहीं हुआ है। लोग लगातार इसके संक्रमण की जद में आ रहे हैं और बुरी स्थिति का सामना भी कर रहे हैं। देश के साथ प्रदेश में भी टीकाकरण अभियान जारी है, लेकिन फिलहाल कोरोना से बचाव का यह टीका आम आदमी से काफी दूर है। ऐसे में खुद की सुरक्षा का जिम्मा आम लोगों को खुद ही उठाना है। लिहाजा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आम जनता से अपील की है कि “उत्सव में कमी नहीं आने देना है, संस्कृति और परंपराओं का निर्वहन भी बखूबी करना है, पर अपनी सुरक्षा का ध्यान भी जरूर रखना है। इसलिए मास्क जरूर पहने, दूरियां बनाए रखें, सेनेटाइजर का उपयोग करते रहें।”

भव्य शोभायात्रा के दौरान धार्मिक नगरी बिल्हा हुआ भगवान श्री राम के भक्ति में सराबोर, जुटे हजारो की संख्या में रामभक्त…

बिलासपुर (बिल्हा)। संजय मिश्रा

समस्त हिन्दू समाज, विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं श्री राम समिती के संयुक्त तत्वावधान में छत्तीसगढ़ प्रदेश के न्यायधानी बिलासपुर जिला क्षेत्र अंतर्गत धार्मिक नगरी बिल्हा में अयोध्या के भगवान श्री राम मंदिर निर्माण से जुड़े तथ्यों को लेकर भव्य शोभायात्रा निकाली गई,

उक्त भव्य शोभायात्रा का श्री राम मंदिर अग्रसेन (पीपल) चौक बिल्हा से शुभारंभ कर बिल्हा नगर के प्रमुख मार्गों- शनिचरी बाजार, हटरी चौक, फव्वारा चौक, कुटिया मंदिर, गुरूद्वारा रोड़ का भ्रमण करवाते हुए पुन: श्री राम मंदिर में भगवान श्री राम, लक्ष्मण एवं माता जानकी के भव्य आरती के साथ समापन किया गया,

भव्य शोभायात्रा में बिल्हा विधानसभा क्षेत्र के विधायक एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष माननीय धरम लाल कौशिक, भूपेन्द्र सवन्नी, चित्रसेन पाण्डेय सहित बिल्हा विधानसभा क्षेत्र एवं बिलासपुर के हजारो की संखया में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम चंद्र जी महाराज के भक्त जन उपस्थित रहे,

उक्त भव्य राम संकीर्तन शोभायात्रा को सम्पूर्ण हिन्दू समाज में एकता और भाईचारे की भावना को जागृत करनें तथा अयोध्या में भगवान श्री राम जी के भव्य मंदिर निर्माण में सहयोग करनें के प्रमुख उद्देश्य से निकाली गई,

सम्पूर्ण शोभायात्रा भ्रमण के दौरान बिल्हा थाना के वीर जवानों का सराहनीय योगदान रहा।

देखिए वीडियो;

DEVOTIONAL : मकर संक्रांति से ठीक पहले… आज है महाशिवरात्रि… कैसे करें व्रत-पूजन… क्या है इसके लाभ… पढ़िए

धर्म। शिव भक्त मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की व्रत रखकर पूजा करते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से कई प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

पंचांग के अनुसार हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। 11 जनवरी को पौष कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। इस बार मासिक शिवरात्रि पर विशेष संयोग बन रहा है। इस बार सोमवार के दिन मासिक शिवरात्रि का पर्व पड़ रहा है। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन शिव पूजा का विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

पौराणिक मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि के दिन व्रत रखने और पूजा करने से कई प्रकार के दोष समाप्त हो जाते हैं। मासिक शिवरात्रि का विधि पूर्वक व्रत सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। वहीं प्रत्येक कार्य को करने की शक्ति प्राप्त होती है। वहीं जिन कन्याओं के विवाह में देरी या किसी प्रकार की बाधा आ रही है, इस व्रत को विधि पूर्वक करने से इन दिक्कतों छुटकारा मिलता है। वहीं मनोवांछित वर की इच्छा पूर्ण होती है। मासिक शिवरात्रि के दिन भगवान शिव के साथ माता पार्वती और नंदी की भी पूजा का विधान है। इस दिन शिव और माता पार्वती की पूजा करने से दोनों का आर्शीवाद प्राप्त होगा।

मासिक शिवरात्रि पर सुबह स्नान के बाद पूजा आरंभ करनी चाहिए। इस दिन भगवान शिव की प्रिय चीजों का भोग लगाएं। शिव मंत्र और शिव आरती का पाठ करना चाहिए। इसके साथ ही शिव पुराण, शिव स्तुति, शिवाष्टक, शिव चालीसा और शिव श्लोक का पाठ भी शुभ फल प्रदान करता है।

पंचांग के अनुसार 11 जनवरी 2021 को पौष मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। इस दिन चतुर्दशी तिथि का आरंभ 14 बजकर 32 मिनट पर होगा। चतुर्दशी तिथि का समापन 12 जनवरी को 12 बजकर 22 मिनट पर होगा।

काल भैरव जयंती आज, शिव के पांचवे रुद्र अवतार, ऐसे करें पूजा, इन बातों का रखें ध्यान

काल भैरव अष्टमी हर्षोल्लास से मनाई जाएगी। ज्योर्तिविदों का मत है कि इस दिन तंत्र के देवता काल भैरव की प्रसन्नता के लिए विधि-विधान से उनका पूजन करना चाहिए। भैरव की पूजा सांध्यकाल या रात्रि में करना चाहिए। उनके सामने सरसो के तेल का दीपक लगाए। इसके बाद उड़द या दूध की बनी हुई वस्तुए उन्हें अर्पित करे। तामसिक पूजन करने वाले उन्हें मदिरा भी अर्पित करते हैं। साथ ही व्रत रखकर भैरव कथा भी पढ़ना चाहिए। ऐसा करने से आसपास की नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। आर्थिक तंगी से लोगों को राहत मिलती है। भगवान शिव के दो स्वरूप में एक बटुक भैरव और दूसरे काल भैरव है। बटुक भैरव सौम्य स्वरूप है, जबकि काल भैरव रौद्र रूप है। काल भैरव की उत्पत्ति शिव के क्रोध के कारण हुई थी। माना जाता है कि उनके पूजन से सर्व सद्धियों की प्राप्ती होती है।
काल भैरव अष्टमी के दिन ये काम न करें
भैरव अष्टमी पर श्वान की अवहेलना न करें। इस दिन श्वान का पूजन और उसे भोजन कराने का विशेष महत्व है। गृहस्थ लोगों को भगवान भैरव की तामसिक पूजा यथा संभव नहीं करना चाहिए। भैरव तंत्र के देवता माने जाते है इसलिए उनके सौम्य स्वरूप बटुक भैरव की पूजा करे। उनकी पूजा किसी के नाश के लिए न करें। संभवत: भैरव की साधना योग्य गुरु के सानिध्य में करना चाहिए।

सभी सिद्धियों को प्रदान करते भैरव

काली मंदिर खजराना के शिवप्रसाद तिवारी बताते है कि मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन काल भैरव जयंती मनाई जाती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन उनका जन्म हुआ था। काल भैरव को शिवजी का अवतार माना जाता है जो इनका विधिवत पूजन करता है उसे सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है। उन्हें तंत्र का देवता माना जाता है। इसके चलते भूत, प्रेत और उपरी बाधा जैसी समस्या के लिए काल भैरव का पूजन किया जाता है। इस दिन काले कुत्ते को दूध पिलाने से काल भैरव का आर्शीवाद प्राप्त होता है। काल भैरव को दंड देने वाला देवता भी कहा जाता है इसलिए उनका हथियार दंड है। इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करने से भी उनकी विशेष कृषा प्राप्त होती है। उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति चौकी पर गंगाजल छिड़ककर स्थापित करे। इसके बाद काल भैरव को काले, तिल, उड़द और सरसो का तेल अर्पित करे। अंत में श्वान का पूजन भी किया जाता है। इस दिन लोग व्रत रखकर भजनों के जरिए उनकी महिमा भी गाते है।

इन 4 दिनों में कभी नहीं कटवाने चाहिए बाल, नहीं तो घेर लेंगी मुसीबतें

ज्योतिष के मुताबिक, हर ग्रह नक्षत्र का इंसान पर प्रभाव पड़ता है और ये प्रभाव अच्छे भी होते हैं तो बुरे भी। तो यदि आपको भी पैसों की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है तो आप अपने कार्यों में कुछ बदलाव कर समस्या को दूर कर सकते हैं। जैसे की बाल कटवाना, बाल तो प्रत्येक व्यक्ति कटवाता है, चाहे वह पुरूष हो या महिला। किन्तु जाने-अनजाने में हम किसी गलत दिन बाल कटवा लेते हैं, जिसका प्रतिकूल प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है।
हमारे धर्म शास्त्रों में कुछ उपाय बताए गए हैं, जिसे अपनाकर हम अपने जीवन की परेशानियों से निजात पा सकते हैं। अनजाने में हम कुछ गलतियां कर देते हैं जिससे मां लक्ष्मी खफा हो जाती हैं, जिसका नकारात्मक असर हमारे उपर पड़ता है और निगेटिविटी के कारण हर ओर से परेशानी बढ़ने लगती है। सभी दिनों में से सबसे अधिक शुभ बुधवार और शुक्रवार का दिन माना गया है। ज्योतिष के मुताबिक, बुधवार के दिन बाल या नाखून कटवाना काफी शुभ माना गया है। ज्योतिष के मुताबिक, सप्ताह के रविवार, सोमवार, मंगलवार, गुरूवार औऱ शनिवार को भूलकर भी बाल, दाढ़ी औऱ नाखून नहीं कटवाने चाहिए, इससे आप पर नकारात्मकता हावी होती है।
इस दिन बाल कटवाने से घर में कभी भी पैसों की किल्लत नहीं होती और सदैव सुख समृद्धि बनी रहती है। इसलिए बुधवार और शुक्रवार का आपको बाल कटवाने चाहिए। वहीं शुक्रवर का दिन नाखून काटने के लिए अच्छा माना गया है। बता दें कि, शास्त्रों में ये साफ-साफ कहा गया है कि, नाखून या बाल काटने के लिए शुक्रवार का दिन सबसे अधिक अच्छा होता है। ऐसा करने से आपको खूब तरक्की भी मिलती है और किस्मत का भरपूर साथ मिलता है।

महाराष्ट्र : आठ माह बाद खुले सिद्धिविनायक मंदिर … कोविड -19 नियमों का पालन करना जरूरी…

महाराष्ट्र में आठ महीनों से बंद शिरडी व सिद्धिविनायक मंदिर समेत तमाम धार्मिक स्थल सोमवार से एक बार फिर खुल गए। राज्य सरकार ने इस बात का एलान किया है। धार्मिक स्थलों पर जाने के दौरान श्रद्धालुओं को मास्क पहनना और शारीरिक दूरी का पालन करना अनिवार्य होगा। साथ ही कोविड-19 के नियमों का पालन करना भी अनिवार्य होगा।
सिद्धिविनायक मंदिर में रोज एक हजार को प्रवेश
मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर में सोमवार से प्रतिदिन केवल 1000 श्रद्धालुओं को अंदर जाने की अनुमति दी जाएगी। श्रद्धालुओं को मोबाइल एप के माध्यम से पूजा के लिए अलग-अलग समय दिया जाएगा। यह जानकारी रविवार को इसके अध्यक्ष आदेश बांडेकर ने दी। एप से कर सकेंगे सिद्धिविनायक दर्शन की बुकिंग
बांडेकर ने बताया कि सिद्धिविनायक ट्रस्ट ने एक मोबाइल एप विकसित किया है जिसके माध्यम से सोमवार से श्रद्धालु दर्शन के लिए समय बुक कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, श्रद्धालुओं को दर्शन करने के लिए अपने मोबाइल फोन पर ‘श्री सिद्धिविनायक मंदिर’ एप डाउनलोड करना होगा। उन्हें ब्यौरा भरना होगा और समय बुक करना होगा जिसके बाद निर्धारित समय के साथ ‘क्यूआर कोड’ का सृजन होगा। दिन भर में एक हजार लोगों के लिए ‘क्यूआर’ कोड का सृजन किया जाएगा।
आरती और पूजा को छोड़कर हर घंटे सौ लोगों को अंदर जाने की अनुमति दी जाएगी। बांडेकर ने वरिष्ठ नागरिकों से अपील की कि कोविड-19 की स्थिति सामान्य होने तक वे मोबाइल एप पर भगवान गणेश का दर्शन करें। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शनिवार को घोषणा की कि राज्य में धार्मिक स्थल सोमवार से खोले जाएंगे।
मंदिरों में प्रवेश के ये हैं दिशानिर्देश
सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देश के मुताबिक, बिना मास्क श्रद्धालुओं को धार्मिक स्थलों में प्रवेश नहीं मिलेगा। इसके अलावा कोविड के दिशानिर्देश का पालन करना अनिवार्य होगा। एक-दूसरे के बीच छह फीट की दूरी रखनी होगी। 65 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, 10 साल से कम उम्र के बच्चे और बीमार व्यक्तियों को घर पर रहने की सलाह दी गई है। साथ ही धार्मिक स्थल पर सैनिटाइजर की व्यवस्था करने का आदेश दिया गया है।

जानिए नवंबर माह में पड़ने वाले बड़े व्रत त्योहारों के बारे में,इस माह पड़ रहे हैं ये पर्व

नवंबर का माह कार्तिक मास के साथ शुरू हो चुका है। इसके साथ ही कई व्रत त्योहार शुरू हो चुके है।

वेबडेस्क | नवंबर का माह कार्तिक मास के साथ शुरू हो चुका है। इसके साथ ही कई व्रत त्योहार शुरू हो चुके है। इस माह करवा चौथ के साथ दिवाली, धनतेरस, छठ और कार्तिक पूर्णिमा पड़ रही है। जानिए इस माह पड़ने वाले बड़े व्रत त्योहारों के बारे में। नवंबर 2020 में पड़ने वाले व्रत त्योहार 4 नवंबर , बुधवार- करवा चौथ 8 नवबंर – रविवार – अहोई अष्टमी इस दिन महिलाएं संतान की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती है। इ व्रत में शाम को तारे दिखने के बाद अहोई की पूजा करते व्रत तोड़ती है।

11 नवंबर – बुधवार – रमा एकादशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। 13 नवंबर – शुक्रवार- धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को घनतेरस पड़ता है। इस दिन सोना-चांदी के अन्य चीजें खरीदना शुभ माना जाता है। इस दिन दिवाली पूजन के समय लगने वाली गणपति और माता लक्ष्मी की मूर्ति भी लाई जाती है। 14 नवंबर – शनिवार – दिवाली, नरक चतुर्दशी

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तो दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। इस बार इसी दिन नरक चर्तुदशी भी पड़ रहा है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा अर्चना की जाती है। 15 नवंबर – रविवार – गोवर्धन पूजा कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट का त्योहार मनाया जाता है। 16 नवंबर – सोमवार – भाई दूज कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई-बहन का त्योहार भाई दूज मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है।

20 नवंबर – शुक्रवार – छठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को छठ पूजा का त्योहार मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत नहाय खाय से होती है जोकि 18 नवंबर को मनाया जाएगा। 23 नवंबर- सोमवार- अक्षय नवमी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी या आंवला नवमी कहते हैं। पौराणिक मान्याओं के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से लेकर पूर्णिमा तक भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी आवंले के पेड़ पर निवास करते हैं। 25 नवंबर-बुधवार- देव उठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थानी एकादशी और प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। 30 नवंबर-सोमवार- कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली का भी त्योहार मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा में दीपदान का विशेष महत्व होता है

आज से शुरू कार्तिक का महीना, तुलसी पूजन में इन बातों का रखें ख़ास ध्यान…

धर्म। शरद पूर्णिमा के बाद से कार्तिक का महीना लग जाता है। इस बार 1 नवंबर से कार्तिक का महीना लग रहा है। इस महीने में भगवान विष्णु जल में निवास करते हैं, इसलिए इस माह में सुबह सवेरे स्नान करने बहुत फल मिलता है। कार्तिक महीने में तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। इस पूरे महीने में माता तुलसी के सामने दीपक जलाया जाता है। यह कहा जाता है कि माता तुलसी की पूजा करने से बहुत फल मिलता है। चांद-तारों की मौजूदगी में सूर्योदय से पूर्व ही पुण्य प्राप्ति के लिए स्नान करना जरूरी होता है। इस महीने में तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है। कहते हैं कि तुलसी विवाह करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। तुलसी विवाह से घर में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन तुलसी के पौधे का गमला सजाकर उसके चारों ओर ईख का मण्डप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग प्रतीक चुनरी ओढ़ाते हैं। तुलसी पूजन से पहले तुलसी पूजा के नियमों को भी जान लेना चाहिए।

इस बात का ध्यान रखें कि तुलसी पत्र को बिना स्नान किए नहीं तोड़ना चाहिए। कभी भी शाम को तुलसी के पत्तों को शाम के समय तोड़ना नहीं चाहिए। पूर्णिमा, अमावस्या, द्वादशी, रविवार व संक्रान्ति के दिन दोपहर दोनों संध्या कालों के बीच में तथा रात्रि में तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए। किसी के जन्म के समय और मुत्यु के समय घर में सूतक लग जाते हैं, ऐसे में तुलसी को नहीं ग्रहण करें। क्योंकि तुलसी श्री हरि के स्वरूप वाली ही हैं। तुलसी को दांतों से चबाकर नहीं खाना चाहिए।